ई-कचरे से पर्यावरण की रक्षा: उत्तर प्रदेश के स्कूल बनेंगे 'ई-वेस्ट कलेक्शन सेंटर'

23 Sep 2026
ई-कचरे से पर्यावरण की रक्षा: उत्तर प्रदेश के स्कूल बनेंगे 'ई-वेस्ट कलेक्शन सेंटर'

"कचरे की पहचान से कौशल विकास की उड़ान: उत्तर प्रदेश के प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों में संवरेगा पर्यावरण, बच्चे सीखेंगे वेस्ट मैनेजमेंट का नया पाठ।"

 

उत्तर प्रदेश के शिक्षा विभाग ने पर्यावरण संरक्षण और व्यावहारिक शिक्षा की दिशा में एक अनूठी और दूरदर्शी पहल की शुरुआत की है। प्रदेश के बेसिक (परिषदीय) और माध्यमिक विद्यालयों को अब ‘ई-कचरा संग्रहण केंद्र’ (E-Waste Collection Centers) के रूप में विकसित किया जाएगा। इस ऐतिहासिक कदम का मुख्य उद्देश्य स्कूली छात्रों को इलेक्ट्रॉनिक कचरे की पहचान, उसके दुष्परिणामों और उसके सुरक्षित प्रबंधन (E-Waste Management) के प्रति जागरूक बनाना है।

इस नई व्यवस्था के तहत, छात्र अपने घरों में बेकार पड़े पुराने व खराब इलेक्ट्रॉनिक सामानों को अपने अभिभावकों की सहमति से स्कूल में स्थापित संग्रह केंद्र पर जमा कर सकेंगे। इससे न केवल घरों से जहरीला और अनुपयोगी ई-कचरा बाहर निकलेगा, बल्कि बच्चों के लिए यह पर्यावरण संरक्षण और कौशल विकास का एक जीवंत माध्यम भी बनेगा।

एनईपी 2020: व्यावहारिक कौशल और स्वच्छता का संगम

राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के तहत सैद्धांतिक ज्ञान के साथ-साथ व्यावहारिक कौशल विकास पर विशेष बल दिया गया है। उत्तर प्रदेश सरकार इसी नीति को धरातल पर उतारते हुए स्कूली बच्चों को जीवन- उपयोगी कौशलों से जोड़ रही है।

विद्यालयों में खराब और बेकार पड़े उपकरणों को पूरी तरह सुरक्षित एवं सूखे कंटेनरों में एकत्रित किया जाएगा। इसमें मुख्य रूप से:

खराब मोबाइल फोन और चार्जर

अनुपयोगी कैलकुलेटर

कंप्यूटर की-बोर्ड, माउस और केबल

अन्य छोटे इलेक्ट्रॉनिक उपकरण शामिल होंगे।

शिक्षकों के अनुसार, बच्चों को यह सिखाया जाएगा कि ई-कचरा सामान्य कचरे से किस प्रकार अलग है और इसे सुरक्षित तरीके से निपटाना क्यों आवश्यक है।

दो चरणों में चलेगा विशेष अभियान: 30 सितंबर से 31 अक्टूबर तक

स्कूल शिक्षा महानिदेशक मोनिका रानी के दिशा-निर्देशों के अनुसार, राज्य भर के स्कूलों में कचरा प्रबंधन और स्वच्छता को लेकर दो चरणों में विशेष अभियान संचालित किया जाएगा:

पहला चरण: 30 सितंबर तक।

दूसरा चरण: 2 अक्टूबर से 31 अक्टूबर तक।

इस अभियान का मुख्य उद्देश्य स्कूलों के भीतर स्वच्छता बनाए रखने के साथ-साथ एक ईको-फ्रेंडली (Eco-Friendly) वातावरण का निर्माण करना है।

चार रंगों के कूड़ेदान: कचरा पृथक्करण का वैज्ञानिक पाठ

स्कूलों में कचरे के सही निस्तारण और बच्चों को वैज्ञानिक पृथक्करण (Waste Segregation) सिखाने के लिए चार अलग-अलग रंगों के कूड़ेदान लगाए जा रहे हैं:

कूड़ेदान का रंगकचरे का प्रकारशामिल सामग्रियां
हरा कूड़ेदानगीला कचराबचा हुआ भोजन, सब्जी और फलों के छिलके।
नीला कूड़ेदानसूखा कचराकागज, प्लास्टिक, कांच, रबर और लकड़ी।
लाल कूड़ेदानस्वच्छता अपशिष्ट (Sanitary Waste)प्रयुक्त डायपर, सैनिटरी पैड और बायो-मेडिकल अपशिष्ट।
काला कूड़ेदानविशेष देखभाल अपशिष्ट (Hazardous Waste)पेंट के डिब्बे, एक्सपायर्ड दवाएं, खराब बल्ब और रासायनिक वेस्ट।

जिला स्तरीय प्रभाव: 1,600 से अधिक स्कूल और 1 लाख बच्चे

इस योजना का क्रियान्वयन जमीनी स्तर पर व्यापक रूप से शुरू हो चुका है। उदाहरण के तौर पर, हाथरस जिले के ही 1,236 परिषदीय और लगभग 400 माध्यमिक स्कूलों में यह सुविधा शुरू की जा रही है।

इस पहल के माध्यम से अकेले जिले के लगभग 1 लाख बच्चों को ई-कचरा प्रबंधन और पर्यावरण संरक्षण का प्रत्यक्ष प्रशिक्षण मिलेगा। जब ये बच्चे अपने घरों और आसपास के लोगों को ई-कचरे के प्रति जागरूक करेंगे, तो इसका प्रभाव पूरे समाज पर देखने को मिलेगा।

शिक्षाविदों, अभिभावकों और अधिकारियों के विचार

इस दूरदर्शी पहल को समाज के हर वर्ग से व्यापक समर्थन और सराहना मिल रही है:

"बच्चों के लिए कौशलात्मक पढ़ाई बहुत जरूरी है। स्वच्छता हम सभी की जिम्मेदारी है। बच्चों को पर्यावरण और स्वच्छता का पाठ पढ़ाते हुए कौशल विकास से जोड़ना उनके उज्ज्वल भविष्य और करियर को आगे बढ़ाएगा।"

— राजेश कुमार, अभिभावक

"बच्चों को व्यावहारिक और कौशल-परक शिक्षा देना वर्तमान समय की सबसे बड़ी जरूरत है। स्कूलों में ई-कचरा प्रबंधन सिखाना एक बेहद प्रशंसनीय कदम है। इसे प्रदेश के सभी विद्यालयों में पूर्ण निष्ठा के साथ लागू किया जाना चाहिए।"

— सुरेश शर्मा, जिलाध्यक्ष, उत्तर प्रदेशीय प्राथमिक शिक्षक संघ

"सरकार द्वारा स्वच्छता और ई-कचरा प्रबंधन को लेकर दिए गए दिशा-निर्देशों का पालन नियमानुसार कराया जा रहा है। स्कूलों में शिक्षक बच्चों को स्वच्छता का पाठ पढ़ा रहे हैं। ई-कचरा प्रबंधन सीखने से बच्चों में पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी की भावना विकसित होगी।"

— गिरिराज सिंह, प्रभारी जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी, हाथरस

निष्कर्ष

उत्तर प्रदेश के स्कूलों को ई-कचरा संग्रहण केंद्र बनाने की यह पहल केवल कचरा प्रबंधन तक सीमित नहीं है। यह आने वाली पीढ़ी को पर्यावरण के प्रति संवेदनशील, जिम्मेदार और तकनीकी रूप से जागरूक नागरिक बनाने का एक सशक्त अभियान है। जब विद्यालय ज्ञान के केंद्र के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण के संवाहक बनेंगे, तो एक स्वच्छ, हरित और कौशल-युक्त भारत का सपना स्वतः साकार होगा।


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