स्वाद और आदत के मुखौटे में छिपा मौत का मीठा जहर, खामोश कातिल बना चबाने वाला तंबाकू

02 Oct 2026
स्वाद और आदत के मुखौटे में छिपा मौत का मीठा जहर, खामोश कातिल बना चबाने वाला तंबाकू

चबाते-चबाते छिनती सांसें, आईएचएमई के अध्ययन ने खोली वैश्विक और क्षेत्रीय जनस्वास्थ्य संकट की परतें।

 

 

तंबाकू नियंत्रण को लेकर वर्षों से जारी वैश्विक अभियानों के बावजूद चबाने वाले तंबाकू (Chewing Tobacco) से उपजा स्वास्थ्य संकट दुनिया के सामने एक गंभीर चुनौती बनकर उभर रहा है। 'द लैंसेट ग्लोबल हेल्थ' में प्रकाशित और इंस्टीट्यूट फॉर हेल्थ मेट्रिक्स एंड इवैल्यूएशन (IHME) द्वारा किए गए 'ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज स्टडी 2023' के ताज़ा आंकड़े बताते हैं कि तंबाकू का यह रूप अब केवल व्यक्तिगत आदत नहीं, बल्कि एक व्यापक जनस्वास्थ्य आपदा का रूप ले चुका है।

24 करोड़ से अधिक लोग गिरफ्त में, मौतों का आंकड़ा चिंताजनक

अध्ययन के अनुसार, वर्ष 2023 में चबाने वाले तंबाकू के प्रत्यक्ष उपयोग से दुनियाभर में करीब 2.51 लाख लोगों की अकाल मृत्यु हुई। 1990 से 2023 तक के 33 वर्षों के आंकड़ों का विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट हुआ है कि वैश्विक स्तर पर तंबाकू चबाने वालों की संख्या में कोई उल्लेखनीय गिरावट दर्ज नहीं की गई, बल्कि 24 देशों में इसमें चिंताजनक वृद्धि देखी गई है।

उपयोगकर्ताओं की संख्या: दुनिया में 15 वर्ष और उससे अधिक आयु के लगभग 24.1 करोड़ लोग इसका सेवन कर रहे हैं, जो वैश्विक आबादी का करीब 3.9% है।

लैंगिक असमानता: पुरुषों में इसका सेवन महिलाओं की तुलना में दोगुनी से भी अधिक दर पर पाया गया है। पुरुषों में 60 से 64 वर्ष की आयु वर्ग के बीच इसका इस्तेमाल सबसे अधिक देखा गया।

33 वर्षों का दुखद रिपोर्ट कार्ड: 1990 से 2023 के बीच चबाने वाले तंबाकू से होने वाले कुल स्वास्थ्य नुकसान (DALYs) में 116% की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। केवल 2023 में ही 64.8 लाख स्वस्थ जीवन-वर्षों का नुकसान हुआ, जिनमें से 61.7 लाख वर्ष समय से पहले हुई मौतों के कारण गंवा दिए गए।

दक्षिण एशिया: वैश्विक संकट का मुख्य केंद्र

अध्ययन का सबसे चौंकाने वाला पहलू दक्षिण एशिया पर इसका भयावह प्रभाव है। यह क्षेत्र चबाने वाले तंबाकू का वैश्विक गढ़ बन चुका है।

क्षेत्र / देशउपयोग दर (15+ आयु वर्ग)वैश्विक मौतों में हिस्सेदारी / स्थिति
दक्षिण एशिया (समग्र)14.6%कुल मौतों का लगभग 84% (2.10 लाख मौतें)
पलाऊ (Palau)24.4%दुनिया में सर्वाधिक उपयोग दर
बांग्लादेश23.4%दक्षिण एशिया में शीर्ष पर; महिलाओं में उच्च दर
नेपाल17.5%उच्च जोखिम वाला देश
भारतगंभीर स्तर परपुरुषों एवं महिलाओं दोनों में स्वास्थ्य नुकसान का बड़ा केंद्र

भारत, बांग्लादेश, पाकिस्तान, नेपाल और म्यांमार जैसे देशों में जनसंख्या का आकार बड़ा होने के कारण बीमारी और मौतों का कुल बोझ भी सबसे अधिक केंद्रित है। बांग्लादेश जैसे देशों में तो 30 वर्ष से अधिक उम्र के कई समूहों में महिलाओं के बीच इसका सेवन पुरुषों से भी अधिक पाया गया, जो इसके गहरे सामाजिक-सांस्कृतिक ताने-बाने को दर्शाता है।

सेहत पर तीखा वार: स्ट्रोक और कैंसर का सबसे बड़ा कारण

शोधकर्ताओं ने चबाने वाले तंबाकू के सेवन से होने वाले 6 प्रमुख गंभीर स्वास्थ्य दुष्प्रभावों का व्यापक आकलन किया है:

स्ट्रोक (Stroke): तंबाकू चबाने से होने वाली शारीरिक क्षति में स्ट्रोक का हिस्सा सबसे ज्यादा पाया गया।

होंठ और मुंह का कैंसर (Lip & Oral Cavity Cancer): दुनिया में होंठ और मुंह के कैंसर से होने वाले कुल स्वास्थ्य नुकसान का 17.3% हिस्सा सीधे तंबाकू चबाने से जुड़ा है। दक्षिण एशिया में यह आंकड़ा बढ़कर खौफनाक 30.5% तक पहुंच जाता है।

अन्य गंभीर कैंसर: इसमें खाने की नली (Esophageal Cancer), गले के अन्य कैंसर, गले के ऊपरी हिस्से और नाक के पीछे होने वाले (Nasopharyngeal) कैंसर शामिल हैं।

आगे की राह: लक्षित रणनीति और कड़े नीतिगत बदलाव की आवश्यकता

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि धूम्रपान (Smoking) की तुलना में चबाने वाले तंबाकू पर ऐतिहासिक रूप से कम ध्यान दिया गया है। इसे रोकने के लिए पारंपरिक 'एक-समान' नीतियां कारगर साबित नहीं होंगी।

स्थानीय व सांस्कृतिक दृष्टिकोण: उम्र, लिंग और क्षेत्रीय संस्कृति के अनुसार जागरूकता अभियान और तंबाकू छुड़ाने (Tobacco Cessation) के कार्यक्रम तैयार करने होंगे।

एनसीडी रणनीतियों में एकीकरण: गैर-संचारी रोगों (NCDs) के नियंत्रण अभियानों में चबाने वाले तंबाकू की रोकथाम को मुख्यधारा में शामिल करना अनिवार्य है।

सख्त नीतियां व परामर्श: बिक्री पर कड़े नियंत्रण के साथ-साथ प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर तंबाकू छुड़ाने के लिए परामर्श सेवाओं का व्यापक विस्तार किया जाना चाहिए।

यदि समय रहते चबाने वाले तंबाकू के विरुद्ध ठोस, लक्षित और कठोर कदम नहीं उठाए गए, तो यह धीमा ज़हर आने वाली पीढ़ियों के स्वास्थ्य और देश की आर्थिक उत्पादकता को इसी तरह दीमक की तरह चाटता रहेगा।

 

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