सतत् कृषि से समृद्ध किसान: 'परंपरागत कृषि विकास योजना' (PKVY) के सफलता के 10 वर्ष

22 Sep 2026
सतत् कृषि से समृद्ध किसान: 'परंपरागत कृषि विकास योजना' (PKVY) के सफलता के 10 वर्ष

रसायन-मुक्त खेती, आधुनिक प्रमाणन और मजबूत डिजिटल बाजार से बदलती भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था।

 

 

भारतीय कृषि ऐतिहासिक रूप से अपने पारंपरिक ज्ञान, विविधता और प्राकृतिक-पारिस्थितिक संतुलन के लिए जानी जाती रही है। हालांकि, आधुनिक दौर में ‘इनपुट इंटेंसिव कृषि’ (रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग) के कारण मृदा क्षरण, जल प्रदूषण और खाद्य सुरक्षा पर गंभीर खतरे मंडराने लगे। इस स्थिति को समझते हुए और पर्यावरण संतुलन को पुनर्जीवित करने के उद्देश्य से भारत सरकार ने राष्ट्रीय सतत् कृषि मिशन के तहत वर्ष 2015 में 'परंपरागत कृषि विकास योजना' (PKVY) की शुरुआत की।

पिछले एक दशक (2015-2025) में यह योजना देश में जैविक कृषि आंदोलन की सबसे बड़ी आधारशिला बनकर उभरी है। इसने किसानों को न केवल रसायन-मुक्त खेती सिखाने का एक मंच दिया है, बल्कि उन्हें विश्वसनीय प्रमाणन और लाभकारी बाजारों से भी सीधे जोड़ा है।

पीकेवीवाई के मुख्य उद्देश्य

परंपरागत कृषि विकास योजना का प्राथमिक लक्ष्य किसान-केंद्रित, कम लागत वाली और पर्यावरण-अनुकूल तकनीकों को बढ़ावा देना है:

मृदा स्वास्थ्य एवं संसाधन संरक्षण: मिट्टी की उर्वरता में सुधार करना और प्राकृतिक जल-भूमि संसाधनों की रक्षा करना।

रसायन-मुक्त उत्पादन: कीटनाशकों एवं रासायनिक खाद पर निर्भरता खत्म कर शुद्ध व स्वस्थ खाद्य पदार्थों का उत्पादन करना।

लागत में कमी व आय में वृद्धि: पारंपरिक तकनीकों के उपयोग से खेती की लागत घटाना और जैविक उपज के बेहतर मूल्य से किसानों की आय बढ़ाना।

समूह एवं उद्यमिता विकास: किसानों के समूह (क्लस्टर) बनाकर प्रसंस्करण, ब्रांडिंग और सीधे विपणन (मार्केटिंग) को बढ़ावा देना।

क्लस्टर मॉडल और 31,500 रुपये प्रति हेक्टेयर की सहायता

पीकेवीवाई की सफलता के केंद्र में इसका क्लस्टर-आधारित दृष्टिकोण है। योजना के तहत 20-20 हेक्टेयर के समूहों में किसानों को संगठित किया जाता है, जिससे संसाधनों की साझेदारी आसान होती है और लागत कम आती है।

योजना के अंतर्गत जैविक खेती अपनाने वाले किसानों को 3 वर्ष की अवधि के लिए ₹31,500 प्रति हेक्टेयर की वित्तीय सहायता दी जाती है:

ऑन-फार्म और ऑफ-फार्म जैविक इनपुट: ₹15,000 (प्रत्यक्ष लाभ अंतरण - DBT द्वारा)

प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण: ₹9,000

मार्केटिंग, पैकेजिंग और ब्रांडिंग: ₹4,500

प्रमाणन और अवशेष विश्लेषण (Residue Analysis): ₹3,000

पारदर्शी कार्यान्वयन ढांचा

पात्रता: अधिकतम 2 हेक्टेयर भूमि सीमा वाले सभी किसान व संस्थान पात्र हैं।

आवेदन प्रक्रिया: किसान अपनी 'क्षेत्रीय परिषदों' (Regional Councils) के माध्यम से नामांकन कराते हैं।

स्वीकृति व निधि वितरण: क्षेत्रीय परिषदें वार्षिक कार्य योजना तैयार कर कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय को भेजती हैं। केंद्र से स्वीकृति मिलने के बाद राज्य सरकारों के माध्यम से राशि सीधे डीबीटी (DBT) तंत्र द्वारा किसानों के खातों में हस्तांतरित की जाती है।

जैविक प्रमाणन की दोहरी और समावेशी व्यवस्था

जैविक खेती में सबसे बड़ी बाधा गुणवत्ता और विश्वास की होती है, जिसे पीकेवीवाई ने दो मजबूत प्रमाणन प्रणालियों से दूर किया है:

1. तृतीय-पक्ष प्रमाणन (NPOP): वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय का 'राष्ट्रीय जैविक उत्पादन कार्यक्रम' (NPOP) अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप प्रमाणन देता है, जिससे भारतीय किसान वैश्विक बाजारों में निर्यात कर सकते हैं।

2. सहभागी गारंटी प्रणाली (PGS-India): कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के तहत यह एक समुदाय-आधारित और किफायती प्रमाणन प्रणाली है। इसमें किसान समूह आपस में निरीक्षण और सत्यापन करके उपज को 'जैविक' घोषित करते हैं। यह मुख्य रूप से घरेलू बाजार के लिए बहुत प्रभावी है।

3. वृहद क्षेत्र प्रमाणन (Large Area Certification - LAC): 2020-21 में शुरू किए गए इस कार्यक्रम के तहत उन क्षेत्रों (आदिवासी बेल्ट, द्वीप, पूर्वोत्तर राज्य) में तेजी से प्रमाणन दिया जाता है जहां कभी रासायनिक खेती नहीं हुई। इसने रूपांतरण अवधि (Conversion Period) को 2-3 साल से घटाकर महज कुछ महीनों का कर दिया है।

10 वर्षों की ऐतिहासिक उपलब्धियां (2015 - 2025)

मानक / उपलब्धि क्षेत्रआंकड़े एवं विवरण
जारी की गई कुल राशि₹2,265.86 करोड़ (30.01.2025 तक)
जैविक क्षेत्र व क्लस्टर15 लाख हेक्टेयर क्षेत्र कवर, 52,289 क्लस्टर गठित
लाभान्वित किसान25.30 लाख किसान (फरवरी 2025 तक)
एफपीओ (FPO) पंजीकरण10,000 एफपीओ योजना के तहत 9,268 एफपीओ पंजीकृत (31.12.2024 तक)
डिजिटल पोर्टल (jaivikkheti.in)6.23 लाख किसान, 19,016 स्थानीय समूह और 8,676 खरीदार पंजीकृत
100% जैविक क्षेत्र / LAC उपलब्धियां

- लक्षद्वीप: पूरी 2,700 हेक्टेयर कृषि भूमि जैविक प्रमाणित।


 

- सिक्किम: LAC के तहत 60,000 हेक्टेयर का समर्थन (दुनिया का पहला 100% जैविक राज्य)।


 

- कार निकोबार और नानकॉरी द्वीप: 14,491 हेक्टेयर भूमि LAC प्रमाणित।


 

- दंतेवाड़ा (छत्तीसगढ़): 50,279 हेक्टेयर भूमि LAC के तहत अपनाई गई।


 

- लद्दाख: 5,000 हेक्टेयर भूमि हेतु ₹11.475 लाख की सहायता स्वीकृति।

निष्कर्ष: हरित और समृद्ध भविष्य का रोडमैप

परंपरागत कृषि विकास योजना (PKVY) ने यह साबित कर दिया है कि पारंपरिक कृषि ज्ञान को जब आधुनिक तकनीक, पारदर्शी वित्तीय सहायता (DBT) और डिजिटल मार्केटिंग से जोड़ा जाता है, तो इसके परिणाम दूरगामी होते हैं। प्राकृतिक खेती पर राष्ट्रीय मिशन (NMNF) के साथ पीकेवीवाई का तालमेल भारत को न केवल खाद्य सुरक्षा में आत्मनिर्भर बना रहा है, बल्कि मिट्टी के स्वास्थ्य और जलवायु लचीलेपन (Climate Resilience) को सुनिश्चित करते हुए 'आत्मनिर्भर भारत' के संकल्प को साकार कर रहा है।


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