वैश्विक तापमान वृद्धि और भारत का ऐतिहासिक योगदान: 'एनवायर्नमेंटल रिसर्च कम्युनिकेशन्स' के अध्ययन का विश्लेषण

09 Sep 2026
वैश्विक तापमान वृद्धि और भारत का ऐतिहासिक योगदान: 'एनवायर्नमेंटल रिसर्च कम्युनिकेशन्स' के अध्ययन का विश्लेषण

क्रैनफील्ड यूनिवर्सिटी (ब्रिटेन) और आईआईटी खड़गपुर के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक हालिया अध्ययन के अनुसार, ऐतिहासिक उत्सर्जन के मामले में भारत दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा तापमान बढ़ाने वाला देश बन गया है। जानिए अर्थव्यवस्था, कृषि और ऊर्जा क्षेत्र के इस प्रभाव से जुड़ी पूरी रिपोर्ट।

 

 

प्रमुख निष्कर्ष एवं ऐतिहासिक स्थिति

1750 से 2024 तक के ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन के आंकड़ों का विश्लेषण करने के बाद वैज्ञानिकों ने पाया कि भारत के उत्सर्जन ने वैश्विक औसत तापमान में लगभग 0.05°C की वृद्धि की है।

शीर्ष 5 उत्सर्जक देश/समूह:

अमेरिका (वैश्विक तापमान में ~0.27°C की वृद्धि के लिए जिम्मेदार)

चीन

रूस

यूरोपीय संघ

भारत (~0.05°C की वृद्धि)

1990 के बाद का दौर: भारत के कुल तापमान प्रभाव का 50% से अधिक हिस्सा 1990 के बाद दर्ज किया गया है। इसका मुख्य कारण पिछले तीन दशकों में हुआ तीव्र औद्योगीकरण, शहरीकरण और ऊर्जा मांग में वृद्धि है।

क्षेत्रवार उत्सर्जन और प्रभाव (Sectoral Breakdown)

अध्ययन में 'फेयर मॉडल' (FaIR Model) का उपयोग कर कार्बन डाइऑक्साइड ($CO_2$), मीथेन ($CH_4$) और नाइट्रस ऑक्साइड ($N_2O$) के संयुक्त प्रभावों को मापा गया:

[भारत का कुल तापमान प्रभाव]

 ├── ऊर्जा क्षेत्र (Energy Sector): ~61%

 └── कृषि क्षेत्र (Agriculture Sector): ~28%

ऊर्जा क्षेत्र (61% योगदान):

बिजली उत्पादन और परिवहन के लिए कोयले तथा तेल जैसे जीवाश्म ईंधनों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल।

बढ़ती आर्थिक गतिविधियों के कारण बिजली की मांग का एक बड़ा हिस्सा अब भी कोयले से पूरा होना।

कृषि क्षेत्र (28% योगदान):

धान की खेती एवं पशुपालन: इनसे अत्यधिक मात्रा में मीथेन गैस निकलती है। हालांकि मीथेन वातावरण में कम समय तक रहती है, लेकिन यह $CO_2$ की तुलना में गर्मी को रोकने में कहीं अधिक प्रभावी होती है।

कृषि गतिविधियां: इनसे नाइट्रस ऑक्साइड का उत्सर्जन होता है, जो जलवायु परिवर्तन को तेज़ करता है।

अध्ययन की कार्यप्रणाली और सीमाएं

विभिन्न आधार वर्ष (Base Years): शोधकर्ताओं ने ऐतिहासिक जिम्मेदारी का आकलन करने के लिए 1750, 1947 और 1990 को आधार वर्ष मानकर विश्लेषण किया।

अनिश्चितता और सिमुलेशन: 18वीं और 19वीं सदी के आंकड़ों की सीमित उपलब्धता को देखते हुए शोधकर्ताओं ने सटीक औसत अनुमान के लिए 1,000 से अधिक सिमुलेशन किए।

प्रमुख सीमाएं: इस अध्ययन में मुख्य रूप से देश की भौगोलिक सीमा के भीतर होने वाले उत्सर्जन को शामिल किया गया है। इसमें वनों के कटाव, भूमि उपयोग में बदलाव और जंगलों द्वारा कार्बन सोखने (Carbon Sinks) जैसे कारकों को शामिल नहीं किया गया है।

भविष्य की चुनौतियां और समाधान (2070 नेट-जीरो लक्ष्य)

भारत ने वर्ष 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन (Net-Zero Emissions) हासिल करने का संकल्प लिया है। इस लक्ष्य को पाने के लिए ऊर्जा और कृषि दोनों क्षेत्रों में त्वरित और संतुलित बदलाव की आवश्यकता है:

ऊर्जा क्षेत्र में:

कोयले पर निर्भरता को चरणबद्ध तरीके से कम करना।

सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और अन्य नवीकरणीय/स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों का विस्तार।

कृषि क्षेत्र में:

पशु आहार सुधार: पशुओं के चारे की गुणवत्ता बदलकर मीथेन उत्सर्जन को कम करना।

जल प्रबंधन: धान के खेतों में जल भराव की पारंपरिक तकनीकों में बदलाव (जैसे 'अल्टरनेट वेटिंग एंड ड्राइंग' विधि) अपनाना।

यह अध्ययन स्पष्ट करता है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने की जिम्मेदारी केवल पुराने औद्योगिक राष्ट्रों तक सीमित नहीं है। भारत जैसे तेजी से बढ़ते विकासशील देशों को अपनी आर्थिक वृद्धि के साथ पर्यावरण सुरक्षा का संतुलन बनाना होगा।


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