भिक्षामुक्त भारत की ओर: सामाजिक-आर्थिक लाचारी और संगठित सिंडिकेट के बीच झूलती हकीकत
मल्टी-करोड़ माफिया, बदलती सरकारी नीतियां और पुनर्वास के नए मॉडल—जानिए भारत में भिक्षावृत्ति की जटिल चुनौती और समाधान का पूरा ढांचा।
भारत आज वैश्विक मंच पर एक उभरती आर्थिक महाशक्ति है, लेकिन इस तीव्र विकास के बीच शहरी केंद्रों में भीख मांगने की समस्या एक गंभीर कड़वा विरोधाभास बनकर खड़ी है। एक अनुमान के अनुसार, देश में लगभग 5 लाख लोग भिक्षावृत्ति से जुड़े हैं। अधिकांश राज्यों में भीख मांगना कानूनन दंडनीय अपराध होने के बावजूद यह स्थिति बनी हुई है। वास्तव में, यह संकट केवल अत्यधिक गरीबी और लाचारी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक सुसंगठित और मुनाफा कमाने वाला आपराधिक सिंडिकेट भी सक्रिय है।
शहरी संकट का जनसांख्यिकीय और क्षेत्रीय परिदृश्य
राष्ट्रीय जनगणना और केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि भारत में भीख मांगने की समस्या का क्षेत्रीय और सामाजिक प्रसार काफी असमान है:
राज्यवार स्थिति: पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश में भिक्षामुक्त आबादी की संख्या सर्वाधिक है। उत्तर प्रदेश में बाल भिक्षावृत्ति की दर चिंताजनक है, जबकि पश्चिम बंगाल में शारीरिक रूप से अक्षम (दिव्यांग) भिखारियों का अनुपात अधिक है। इसके अलावा बिहार, राजस्थान, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, असम और ओडिशा में भी यह संख्या काफी है।
लैंगिक वितरण: राष्ट्रीय स्तर पर कुल भिखारी आबादी में 53.13% पुरुष और 46.87% महिलाएं हैं।
धार्मिक और लैंगिक अंतर: कुल भिखारी आबादी में मुस्लिम समुदाय की हिस्सेदारी लगभग 25% है, जहाँ महिलाओं का अनुपात (56.38%) पुरुषों (43.61%) से अधिक है। वहीं, हिंदू समुदाय की हिस्सेदारी 72.2% है। अन्य धार्मिक समूहों जैसे ईसाई (0.88%), सिख (0.45%), बौद्ध (0.25%), और जैन (0.06%) की संख्या अत्यंत सीमित है।
संगठित सिंडिकेट: मानवीय लाचारी का व्यवसायीकरण
समाजशास्त्रियों के अनुसार भिक्षावृत्ति में लिप्त आबादी को दो मुख्य श्रेणियों में बांटा जा सकता है:
मजबूर भिखारी: वे लोग जो अत्यधिक निर्धनता, अचानक आई शारीरिक अक्षमता, विस्थापन या मानसिक बीमारी के कारण सड़कों पर आने को विवश हैं।
पेशेवर भिखारी: वे लोग जो संगठित आपराधिक नेटवर्क का हिस्सा हैं। बड़े शहरों के प्रमुख व्यावसायिक क्षेत्रों, रेलवे स्टेशनों, मेट्रो स्टेशनों और धार्मिक स्थलों पर भीख मांगने के अधिकार के बदले स्थानीय हैंडलर्स को दैनिक आधार पर हिस्सा देना पड़ता है।
यह नेटवर्क सार्वजनिक सहानुभूति हासिल करने के लिए क्रूर तरीकों का उपयोग करता है। गरीब परिवारों से नवजात शिशुओं को किराए पर लेकर नशीली दवाएं दी जाती हैं ताकि वे दिनभर सड़कों पर बेसुध दिखाई दें। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के अनुसार, देश में हर साल औसतन 40,000 बच्चों का अपहरण होता है, जिनमें से एक बड़ा हिस्सा भिक्षावृत्ति माफिया के पास पहुंच जाता है। पैसे ऐंठने के उद्देश्य से बच्चों को अपाहिज या अंधा तक बना दिया जाता है।
अपराधीकरण से पुनर्वास: नीतिगत और कानूनी बदलाव
लंबे समय तक भारत में 'बॉम्बे प्रिवेंशन ऑफ बेगिंग एक्ट, 1959' जैसे प्रांतीय कानूनों के तहत भिक्षावृत्ति को केवल कानून-व्यवस्था की समस्या और अपराध माना जाता रहा। वर्ष 2021 में सर्वोच्च न्यायालय ने सार्वजनिक स्थानों पर भिखारियों पर पूर्ण प्रतिबंध की याचिका खारिज करते हुए कहा कि भीख मांगना बुनियादी रूप से राज्य और समाज की विफलता से उपजा सामाजिक-आर्थिक लक्षण है। बिना संस्थागत विकल्प दिए इसे अपराध घोषित करना मौलिक अधिकारों का हनन है।
इसके पश्चात सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने SMILE (Support for Marginalised Individuals for Livelihood and Enterprise) योजना शुरू की, जिसका मुख्य फोकस दंडात्मक कार्रवाई के बजाय व्यापक पुनर्वास है:
स्माइल-बागरी (SMILE-Bagri) ऐप: फील्ड वर्कर्स के जरिए बेघर व कमजोर लोगों की पहचान, डेटा लॉगिंग और रियल-टाइम ट्रैकिंग के लिए विकसित किया गया डिजिटल टूल।
धार्मिक और पर्यटन स्थलों पर ध्यान: अयोध्या और उज्जैन सहित देश के 30 प्रमुख धार्मिक व पर्यटन स्थलों को भिक्षामुक्त बनाने का पायलट प्रोजेक्ट।
सकारात्मक प्रभाव: संसद में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, चिन्हित किए गए 31,055 से अधिक व्यक्तियों (जिनमें लगभग 2,500 बच्चे शामिल हैं) को पुनर्वास केंद्रों में भेजकर चिकित्सा, शिक्षा और कौशल प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
आगे की राह
इंदौर और सांची जैसे शहरों की सफलता दर्शाती है कि मानव तस्करी के खिलाफ कठोर कानूनी कार्रवाई और सामाजिक सुरक्षा तंत्र के तालमेल से स्थायी परिणाम हासिल किए जा सकते हैं। 'भिक्षामुक्त भारत' के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए ग्रामीण पलायन को नियंत्रित करना, रोजगार के अवसर बढ़ाना, मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को दुरुस्त करना और आपराधिक सिंडिकेट्स का पूर्ण रूप से उन्मूलन करना अनिवार्य है।