फूड वेस्ट: सिर्फ थाली की बर्बादी नहीं, बल्कि धरती के दमघोंटू संकट की बड़ी वजह!

07 Oct 2026
फूड वेस्ट: सिर्फ थाली की बर्बादी नहीं, बल्कि धरती के दमघोंटू संकट की बड़ी वजह!

जितना जरूरी हो, उतना ही खरीदें और परोसें; जरा सी समझदारी बचा सकती है हमारी पृथ्वी को जलवायु परिवर्तन के खतरे से।

 

 

दुनिया में खाने की बर्बादी अब केवल भूख, कुपोषण या गरीबी से जुड़ी समस्या तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह तेजी से हमारे ग्रह के लिए एक गंभीर जलवायु संकट बनती जा रही है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया भर में सड़ने वाले खाद्य कचरे से कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का करीब 10 प्रतिशत हिस्सा पैदा होता है। चौंकाने वाली बात यह है कि यह आंकड़ा विमानन (Aviation) क्षेत्र से होने वाले कुल उत्सर्जन से लगभग पांच गुना अधिक है।

हर दिन एक अरब टन से ज्यादा भोजन की बर्बादी

वैश्विक स्तर पर हर दिन एक अरब टन से अधिक भोजन बिना खाए फेंक दिया जाता है। इस बर्बादी में सबसे बड़ी हिस्सेदारी आम घरों की है, जहां से लगभग 60 प्रतिशत खाद्य कचरा निकलता है। इसका सीधा अर्थ यह है कि हम केवल भोजन की थाली नहीं फेंक रहे, बल्कि उसे उगाने में इस्तेमाल हुई कीमती जमीन, पानी, ऊर्जा और किसानों की महीनों की मेहनत को भी व्यर्थ गंवा रहे हैं।

लैंडफिल के ढेर और मीथेन गैस का घातक खतरा

जब यह बचा हुआ या फेंका गया खाना कचरे के बड़े ढेरों (लैंडफिल) में पहुंचता है, तो समस्या और विकराल हो जाती है। जमीन के नीचे दबे होने के कारण इस कचरे को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिलती। ऐसी स्थिति में सूक्ष्म जीव (Microbes) इस कचरे को विघटित करते हैं, जिससे मीथेन गैस का उत्सर्जन होता है।

मीथेन का प्रभाव: मीथेन एक बेहद शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस है। संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक, 20 साल की अवधि में यह कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में करीब 86 गुना अधिक गर्मी को वातावरण में रोक सकती है।

तेजी से राहत का उपाय: चूंकि मीथेन वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में कम समय तक टिकती है, इसलिए इसके उत्सर्जन को कम करके जलवायु परिवर्तन की रफ्तार पर तुरंत लगाम लगाई जा सकती है।

कृषि भूमि और जंगलों पर बढ़ता अप्रत्यक्ष दबाव

खाने की बर्बादी का असर केवल कचरे तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्राकृतिक संसाधनों का भारी अपव्यय है:

संसाधनप्रभाव एवं स्थिति
कृषि भूमिदुनिया की लगभग 1.4 अरब हेक्टेयर भूमि (कुल कृषि भूमि का 28%) ऐसे भोजन को उगाने में इस्तेमाल होती है जो अंततः खाया ही नहीं जाता।
जल संसाधनइस गैर-जरूरी खेती के चलते अपार मात्रा में पानी व्यर्थ बह जाता है।
जंगलों पर संकटखेती के लिए लगातार वनों की कटाई हो रही है, जिससे वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड सोखने वाले प्राकृतिक सिंक कमजोर हो रहे हैं।

 

दुनिया भर में अपनाए जा रहे नए और अनूठे समाधान

इस संकट से निपटने के लिए कई देशों में सराहनीय कदम उठाए जा रहे हैं:

औपचारिक कचरा प्रबंधन: अफ्रीका के 11 देशों में कचरा बीनने वाले श्रमिकों को औपचारिक व्यवस्था से जोड़कर उन्हें जैविक कचरे से खाद बनाने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है, जिससे उनकी आय और पर्यावरण दोनों को लाभ मिल रहा है।

ब्लैक सोल्जर फ्लाई का उपयोग: मलावी और युगांडा जैसे देशों में विशेष प्रकार की मक्खियों के लार्वा का उपयोग जैविक कचरे को उपयोगी सामग्री में बदलने के लिए किया जा रहा है।

अब तेजी से और ठोस कदम उठाने की जरूरत

वैश्विक स्तर पर 2030 तक प्रति व्यक्ति खाद्य अपशिष्ट (Food Waste) को आधा करने का लक्ष्य रखा गया है, लेकिन इस दिशा में अभी और तेज गति से काम करने की आवश्यकता है। सरकारों के साथ-साथ आम नागरिकों को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी।

जितनी जरूरत हो उतना ही भोजन खरीदना, बचे हुए खाने को सही तरीके से सुरक्षित रखना और जैविक कचरे को अलग करके खाद बनाना, वे छोटे लेकिन बेहद महत्वपूर्ण कदम हैं जो पृथ्वी के भविष्य को सुरक्षित रख सकते हैं।

 

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