हिमालय की रक्षक: वनाग्नि और पर्यावरण संकट के खिलाफ उत्तराखंड के 'महिला मंगल दलों' का साहसिक मोर्चा

02 Oct 2026
हिमालय की रक्षक: वनाग्नि और पर्यावरण संकट के खिलाफ उत्तराखंड के 'महिला मंगल दलों' का साहसिक मोर्चा

‘चिपको’ की धरती से उठी संरक्षण की नई पुकार — चबाते-चबाते जलती पत्तियों के बीच बच्चों की तरह जंगलों को पालतीं पहाड़ की महिलाएं।

 

 

उत्तराखंड के पर्वतीय अंचल में जब गर्मी की आहट के साथ ही चीड़ की पत्तियों की चटचटाहट और धुएं का गुबार उठता है, तो चमोली जिले के गांवों की सड़कें और पगडंडियां एक अनोखी गूंज से भर उठती हैं:

“ऐ दीदी, ऐ भुली, सब सुणी ल्यावा, जंगलों में आग न कोई लगावा,

सरपंच भुला कौं सब साथ द्यावा, जंगलात वालौं को सब साथ द्यावा”

यह महज एक लोकगीत नहीं, बल्कि वनाग्नि (Forest Fires) के खिलाफ गांव-गांव में गूंजती सुरक्षा की हुंकार है। चमोली जिले के दशोली ब्लॉक स्थित कठूड़ और ग्वाड जैसे गांवों में 'महिला मंगल दल' की सदस्य महिलाएं वनों की अनधिकृत कटाई, लापरवाही से लगाई गई आग और पर्यावरणीय विनाश के खिलाफ अग्रिम पंक्ति की योद्धा बनकर उभरी हैं।

"जैसे हमारे बच्चे, वैसे जंगल के बच्चे"
चिपको आंदोलन की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि वाली इस भूमि पर महिला मंगल दल अनौपचारिक ग्राम-स्तरीय संगठनों के रूप में कार्य करते हैं। इनमें 12 चुनी हुई कार्यकारी महिलाओं के साथ गांव की प्रत्येक महिला सदस्य होती है।

कठूड़ गांव की महिला मंगल दल अध्यक्ष ऊषा कनवासी और वरिष्ठ सदस्य गंगोत्री देवी बताती हैं कि वनों में अपने आप आग कम ही लगती है—अधिकतर घटनाएं खेतों के 'आड़ा-फुकान' (फसल अवशेष जलाने), जलती बीड़ी-सिगरेट छोड़ने या शरारती तत्वों की लापरवाही से होती हैं।

निगरानी और नियम: हर महीने की 15 तारीख को नियमित बैठक कर जंगलों की सुरक्षा पर चर्चा की जाती है। यदि कोई ग्रामीण आग बुझाने में सहयोग नहीं करता या लापरवाही बरतता है, तो दल उस पर जुर्माना भी लगाता है।

पारिस्थितिकी से भावनात्मक लगाव: महिलाएं बताती हैं कि आग की लपटें देखते ही वे अपने छोटे बच्चों और दैनिक कामकाज को छोड़कर जंगलों की ओर दौड़ती हैं। उनकी नज़र में जंगल में काफल, बांज, बुरांश और भमौरा के साथ-साथ पक्षियों के घोंसले और काकड़, भालू व बाघ के बच्चे भी उन्हीं के परिवार का हिस्सा हैं।

वनाग्नि का विकराल रूप: 5 वर्षों में 28 गुना बढ़े अलर्ट
उत्तराखंड में वनाग्नि की स्थिति पिछले कुछ वर्षों में अत्यंत भयावह हुई है। वैश्विक तापमान में वृद्धि और जलवायु परिवर्तन का असर हिमालयी राज्यों में स्पष्ट देखा जा रहा है।

सूचकांक / वर्षआंकड़े / स्थितिप्रभाव / टिप्पणी
FSI वनाग्नि अलर्ट (2019-20)~750 अलर्टप्रारंभिक baseline स्थिति
FSI वनाग्नि अलर्ट (2023-24)21,000 से अधिक5 वर्षों में 28 गुना बढ़ोतरी
राष्ट्रीय रैंकिंग (ISFR 2023 vs 2024)13वें स्थान से 1वें स्थान परउत्तराखंड देश में वनाग्नि से सर्वाधिक प्रभावित राज्य बना
मानवीय क्षति (2024)12 मौतें6 वन कर्मियों सहित सर्वाधिक दुखद अकाल मृत्यु



ग्लेशियरों पर मंडराता 'ब्लैक कार्बन' का खतरा
जंगलों की आग केवल पेड़-पौधों और जीवों को ही नुकसान नहीं पहुंचा रही, बल्कि यह हिमालय के ग्लेशियरों के लिए भी एक गंभीर संकट बन चुकी है।

वनाग्नि व कृषि अवशेष धुआं ➔ ब्लैक कार्बन (Black Carbon) उत्सर्जित ➔ ग्लेशियरों (गंगोत्री/चिरबासा) पर जमाव ➔ सौर विकिरण अवशोषण ➔ पिघलने की दर में 400 गुना तक तेजी
वाडिया हिमालयन भूविज्ञान संस्थान के अध्ययनों के अनुसार, गर्मियों में ग्लेशियरों के पास ब्लैक कार्बन की सांद्रता सर्दियों की तुलना में लगभग 400 गुना बढ़ जाती है। चमोली के कुल भूभाग का 66% हिस्सा वन क्षेत्र है, जहां नंदादेवी, सतोपंथ और चौखंबा जैसे विशाल ग्लेशियर स्थित हैं।

वन विभाग की नई रणनीति: जनभागीदारी और प्रशिक्षण
वर्ष 2024 के संकट के बाद उत्तराखंड वन विभाग ने अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव किया है। बद्रीनाथ वन प्रभाग के डीएफओ सर्वेश दुबे के अनुसार, एक वन आरक्षी (Forest Guard) पर 2,000 से 2,500 हेक्टेयर वन क्षेत्र की जिम्मेदारी होती है, जिससे बिना सामुदायिक सहयोग के सुरक्षा असंभव है।

प्रशिक्षण एवं फायर किट: गोपेश्वर पुलिस मैदान में ग्रामीणों को सूखी पत्तियों/लकड़ियों से 'फायर लाइन' बनाने का वैज्ञानिक प्रशिक्षण दिया गया। अति-संवेदनशील 45 वन पंचायतों को फायर किट (रेक, टॉर्च, जैकेट, वाटर बोतल) बांटी गईं।

वित्तीय प्रोत्साहन: अपने वनों की रक्षा करने वाली 50 सर्वश्रेष्ठ वन पंचायतों को ₹30,000 की प्रोत्साहन राशि देने की घोषणा की गई है।

सरकारी सहायता: राज्य सरकार द्वारा महिला व युवा मंगल दलों को ₹4,000 की वार्षिक प्रोत्साहन राशि दी जा रही है। मई 2025 में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इन दलों को 'फर्स्ट रिस्पॉन्डर' बताते हुए उनके लिए विशेष ऋण सहायता नीति लागू करने का ऐलान किया है।

चुनौतियां और नीतिगत बहस
जहां एक ओर ग्रामीणों की भागीदारी से आग पर काबू पाने में सफलता मिल रही है, वहीं विशेषज्ञ और स्थानीय प्रतिनिधि कुछ व्यावहारिक सुधारों की मांग कर रहे हैं:

आजीविका से जुड़ाव: सोनला गांव के सरपंच राकेश मैठाणी और विमल सेमवाल (दशोली ग्राम स्वराज्य मंडल) का मानना है कि यदि ग्रामीणों को वनों से चारा और सीमित संसाधन जुटाने का अधिकार मिले, तो वे इसे अपनी आजीविका का साधन मानकर और अधिक जिम्मेदारी से रक्षा करेंगे।

संस्थागत संशय: सिरमौली वन पंचायत की पूर्व सरपंच मल्लिका विर्दी का तर्क है कि नई ग्राम पंचायत समितियों के स्थान पर सदियों पुरानी पारंपरिक 'वन पंचायतों' को ही सीधे आर्थिक और तकनीकी रूप से सशक्त किया जाना चाहिए, ताकि संरक्षण का भाव 'प्रोजेक्ट' मात्र न बने।

निष्कर्ष: गौरा देवी की विरासत को आगे बढ़ाती नारी शक्ति
चमोली की महिलाएं तपती धूप में वनों से चुने गए बुरांश के फूलों का ठंडा शर्बत पीते हुए गर्व से मुस्कुराती हैं। चिपको आंदोलन की जननी गौरा देवी की इस पावन भूमि पर महिला मंगल दल यह साबित कर रहे हैं कि जब समुदाय अपनी प्राकृतिक विरासत की रक्षा के लिए खड़ा होता है, तो सबसे बड़े संकटों को भी मात दी जा सकती है।

 

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