सुरक्षा का नया कवच: नवजात शिशुओं को निमोनिया से बचाएगी माताओं की नई RSV वैक्सीन
डब्ल्यूएचओ की बहु-खुराक वायल (Multi-dose Vial) को मंजूरी से घटेगी लागत, विकासशील देशों के लाखों मासूमों तक पहुंचेगी जिंदगी की आस।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने माताओं को दी जाने वाली रेस्पिरेटरी सिंसिशियल वायरस (RSV) वैक्सीन 'आरएसवीप्रीएफ' (अब्रिवो) के मल्टी-डोज वायल को प्रीक्वालिफाई कर दिया है। वैश्विक स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण निर्णय है, जो दुनियाभर के नवजात शिशुओं को श्वसन संक्रमण, गंभीर निमोनिया और असामयिक मृत्यु से बचाने में मील का पत्थर साबित होगा।
सिंगल-डोज की तुलना में मल्टी-डोज वायल की उपलब्धता से वैक्सीन की उत्पादन व वितरण लागत में भारी कमी आएगी। इससे विशेष रूप से 'गावी, द वैक्सीन अलायंस' (Gavi) के सहयोग पर निर्भर निम्न और मध्यम आय वाले देशों में बड़े पैमाने पर टीकाकरण अभियान चलाना बेहद आसान हो जाएगा।
गर्भ से ही शिशु को मिलेगी छह महीने की सुरक्षा
आरएसवी एक सामान्य लेकिन अत्यधिक खतरनाक वायरस है। छह महीने से कम उम्र के शिशुओं में यह फेफड़ों के गंभीर संक्रमण, सांस फूलने और निमोनिया का प्रमुख कारण बनता है।
गर्भावस्था की तीसरी तिमाही (28वें सप्ताह के बाद) में जब मां को यह टीका लगाया जाता है, तो उसके शरीर में मजबूत एंटीबॉडी बनती हैं। ये एंटीबॉडीज प्लेसेंटा के माध्यम से गर्भस्थ शिशु तक पहुंचती हैं। जन्म के बाद शुरुआती छह महीनों तक—जब बच्चा सबसे अधिक संवेदनशील होता है—यह सुरक्षा कवच उसे वायरस के घातक हमलों से बचाकर रखता है।
वैश्विक आंकड़ों में आरएसवी का प्रकोप
अस्पताल में भर्ती: 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों में हर साल 36 लाख से अधिक मामले।
सालाना मौतें: लगभग 1 लाख मासूमों की मृत्यु, जिनमें से आधी मौतें 6 महीने से कम उम्र के शिशुओं की होती हैं।
असमान बोझ: आरएसवी से होने वाली 97% मौतें कम और मध्यम आय वाले देशों में दर्ज की जाती हैं, जहाँ समय पर आईसीयू या ऑक्सीजन की सुविधा न मिलने से बच्चे दम तोड़ देते हैं।
सस्ती तकनीक और वैश्विक साझेदारी
डब्ल्यूएचओ ने मार्च 2025 में इस वैक्सीन के सिंगल-डोज वायल को मंजूरी दी थी, जिसके बाद जुलाई 2025 में गावी ने इसके वैश्विक कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार की। अब गेट्स फाउंडेशन के सहयोग से विकसित इस मल्टी-डोज वायल के आने से वैक्सीन की प्रति-खुराक कीमत काफी कम हो जाएगी।
डब्ल्यूएचओ ने स्पष्ट किया है कि देश अपने राष्ट्रीय टीकाकरण ढांचे में या तो इस मातृ आरएसवीप्रीएफ वैक्सीन को शामिल करें या फिर शिशुओं के लिए नीरसेविमैब (Nirsevimab) मोनोक्लोनल एंटीबॉडी विकल्प को अपनाएं।
इलाज से बेहतर बचाव के सिद्धांत पर आधारित यह पहल उन करोड़ों परिवारों के लिए उम्मीद की एक नई किरण है, जहाँ सीमित स्वास्थ्य संसाधनों के कारण नवजात शिशु असामयिक जोखिम का सामना करते हैं।