कुपोषण का दोहरा संकट: 'छिपी भूख' से मोटापे तक, जन आंदोलन ही भारत के विकास का आधार
केवल पेट भरना पोषण नहीं; संतुलित आहार, स्वच्छता और सामुदायिक भागीदारी से ही बनेगा पोषित और सशक्त भारत।
नई दिल्ली। किसी भी राष्ट्र की प्रगति का वास्तविक आकलन केवल उसकी आर्थिक वृद्धि, भव्य बुनियादी ढांचे या तकनीकी उपलब्धियों से नहीं किया जा सकता। देश की असली ताकत उसके नागरिकों के स्वास्थ्य, कार्यक्षमता और जीवन की गुणवत्ता में निहित होती है। भारत में हर वर्ष 1 से 7 सितंबर तक मनाया जाने वाला राष्ट्रीय पोषण सप्ताह (1982 से शुरू) इसी सत्य को रेखांकित करता है कि एक स्वस्थ और पोषित आबादी ही समृद्ध और विकसित भारत की मजबूत आधारशिला है।
आज भारत पोषण के मोर्चे पर एक जटिल 'दोहरी चुनौती' (Double Burden of Malnutrition) का सामना कर रहा है। एक ओर ग्रामीण और वंचित वर्गों में बच्चों का अल्पपोषण (स्टंटिंग, वेस्टिंग), महिलाओं में गंभीर एनीमिया और सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी यानी 'छिपी भूख' (Hidden Hunger) बनी हुई है। वहीं दूसरी ओर, शहरी और युवा आबादी में बदलती जीवनशैली, शारीरिक निष्क्रियता, अत्यधिक स्क्रीन टाइम और जंक/प्रोसेस्ड फूड के सेवन से मोटापा तथा गैर-संचारी रोगों (जैसे मधुमेह और उच्च रक्तचाप) का जोखिम तेजी से बढ़ रहा है।
पोषण का अर्थ और 'छिपी भूख'
पोषण का मतलब केवल पेट भरना या केवल कैलोरी लेना नहीं है, बल्कि शरीर को आवश्यक ऊर्जा के साथ प्रोटीन, विटामिन, आयरन, कैल्शियम, आयोडीन और जिंक जैसे सूक्ष्म पोषक तत्व उपलब्ध कराना है। भोजन मिलने के बावजूद पर्याप्त पोषक तत्वों के अभाव को ही 'छिपी भूख' कहा जाता है। यह बच्चों के मानसिक विकास और महिलाओं की प्रतिरोधक क्षमता को दीमक की तरह कमजोर करती है।
भारत में पोषण का दोहरा संकट │ ┌────────────────────────┴────────────────────────┐ ▼ ▼ अल्पपोषण एवं सूक्ष्म तत्व कमी मोटापा एवं असंचारी रोग • बच्चों में स्टंटिंग व वेस्टिंग • शहरी व युवा आबादी में मोटापा • महिलाओं व किशोरियों में एनीमिया • फास्ट/प्रसेस्ड फूड व स्क्रीन टाइम • 'छिपी भूख' (माइक्रोन्यूट्रिएंट कमी) • मधुमेह, बीपी व हृदय संबंधी रोग
जीवन के पहले 1,000 दिन और मातृ पोषण
विशेषज्ञों के अनुसार, कुपोषण के खिलाफ लड़ाई की शुरुआत जन्म के बाद नहीं, बल्कि गर्भावस्था से ही होनी चाहिए। गर्भावस्था से लेकर बच्चे के 2 वर्ष की आयु तक के पहले 1,000 दिन बच्चे के शारीरिक व मानसिक विकास की नींव तय करते हैं।
शुरुआती 6 महीने: जन्म के पहले घंटे में स्तनपान और केवल मां का दूध अत्यंत आवश्यक है।
किशोरियों व महिलाओं का स्वास्थ्य: एनीमिया से पीड़ित मां एक स्वस्थ बच्चे को जन्म नहीं दे सकती। इसलिए महिलाओं के आहार में समानता और आयरन-फोलिक एसिड की उपलब्धता सुनिश्चित करना जरूरी है।
पारंपरिक थाली, स्वच्छता और सरकारी प्रयास
महंगे पैकेज्ड फूड की जगह भारत के पारंपरिक और स्थानीय खाद्य पदार्थ जैसे श्रीअन्न (मोटे अनाज/Millets), दालें, मौसमी फल और हरी सब्जियां पोषण का किफायती और बेहतरीन समाधान हैं। इसके अलावा, स्वच्छ पेयजल और शौचालय (WASH) का पोषण से सीधा संबंध है; बार-बार होने वाले संक्रमण शरीर में पोषक तत्वों के अवशोषण को रोकते हैं।
सरकार ने 'पोषण अभियान' और 'मिशन सक्षम आंगनवाड़ी एवं पोषण 2.0' के माध्यम से पोषण सेवाओं की पहुंच मजबूत की है। 'पोषण ट्रैकर' जैसे डिजिटल टूल्स से रियल-टाइम मॉनिटरिंग की जा रही है। हालांकि, इस व्यवस्था को सफल बनाने में आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं, स्कूलों और पंचायतों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है।
प्रमुख चुनौतियां और आगे की राह
| क्षेत्र / चुनौती | प्रमुख कारण | समाधान / नीतिगत बदलाव |
|---|---|---|
| क्षेत्रीय असमानता | राज्यों व जिलों के बीच पोषण स्तर में अंतर | स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार रणनीतियां तैयार करना |
| जलवायु परिवर्तन | अनियमित बारिश व सूखा से फसलों का प्रभावित होना | टिकाऊ कृषि, विविध फसलों व श्रीअन्न को बढ़ावा देना |
| गरीबी व आर्थिक चक्र | सीमित आय के कारण पौष्टिक विविधता का अभाव | रोजगार, सामाजिक सुरक्षा व खाद्य सुरक्षा का एकीकरण |
| जीवनशैली व अस्वास्थ्यकर खान-पान | फास्ट फूड, प्रसंस्कृत भोजन व शारीरिक निष्क्रियता | स्कूलों में पोषण शिक्षा, खेलकूद व जागरूकता अभियान |
कुपोषण को केवल स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी मानने के बजाय इसे शिक्षा, स्वच्छता और महिला विकास से जोड़कर 'जन आंदोलन' बनाना होगा। स्वस्थ नागरिक ही एक मजबूत, आत्मनिर्भर और पोषित राष्ट्र का निर्माण कर सकते हैं।